वन्‍दे मातरम् !!!!






Tuesday, September 30, 2014

वैश्विक नेतृत्व के परिदृश्य में परिवर्तन की बयार






            विश्व की ख्याति प्राप्त बिजनेस मैगजीन फोर्ब्‍सने मई 2013 में संसार की शक्तिशाली महिलाओं की सूची जारी की है। इस सूचि पर अगर हम दृष्टि डालें तो हमें न सिर्फ पता चलता है कि सारे विश्व के भिन्न भिन्न क्षेत्रों में महिलाओं का दबदबा बढ़ा है, वरन् शीर्ष पर विद्यमान इन महिलाओं के अदम्य साहस, बुद्धिमानी, संघर्ष क्षमता, राजनैतिक व आर्थिक प्रगति, मानव सेवा आदि गुणों की रोचक जानकारी भी मिलती है जो सभी स्त्री पुरुषों के लिए प्रेरणादायी है।


            जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल ने पुनः विश्व की ताकतवर महिलाओं में शीर्ष स्थान हासिल किया। ब्राजील की राष्ट्रपति दिल्मा राउसेफ दूसरे, अमेरिका की प्रथम महिला मिशेल ओबामा चोथे, हिलेरी क्लिंटन पांचवे, यू. पी. ए. अध्यक्ष सोनिया गांधी नंवे, वा भारत की ही इंद्रा नूयी जो कि पेप्सिको कम्पनी की सी. ई. ओ. हैं दसवें स्थान पर काबिज हैं।


            दिल्मा राउसेफ ने जनवरी 2011 को ब्राजील की प्रथम महिला राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभाला। इसके पहले वह राष्ट्रपति लूला द सिल्वा के चीफ ऑफ स्टाफ के तौर पर कार्यरत थीं। वह एक बुल्गारियन व्यावसायी की बेटी हैं। युवावस्था में साम्यवाद की ओर उनका रुझान बढ़ा और वह सैन्य तानाशाही के खिलाफ मार्कसिस्ट अरबन गुरिल्ला ग्रुप में शामिल हुईं। जिसके लिए उन्हें जेल वा प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। स्कूली शिक्षा के दौरान ब्राजील की सैन्य सरकार के दमन के विरुद्ध उन्होंने सशस्त्र विद्रोह का रास्ता चुना। 46 वर्ष लंबे व संघर्षपूर्ण राजनैतिक जीवन में कभी हार न मानने वाली इस नेता को दुनिया की शक्तिशाली महिलाओं की सूची में दूसरा स्थान हासिल हुआ।


            अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पत्नि मिशेल ओबामा छात्र जीवन से ही राजनीति में काफी सक्रिय रहीं। उन्होंने नस्ल भेद का सख्त विरोध किया इसीलिए उन्हें एंग्री यंग लेडी के नाम से भी जाना जाता है। बराक ओबामा के राष्ट्रपति पद के चुनाव के दौरान मिशेल ने अहम भूमिका निभाई व चुनाव प्रचार में बढ़चढ कर हिस्सा लिया। उनकी भूमिका को बराक ओबामा ने काफी सराहा। मिशेल पेशे से वकील है। बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद मिशेल एक पत्नी और माँ की भूमिका में अपने पति का हर कदम पर साथ देते नजर आती हैं, पर साथ ही महिलाओं, बच्चों की शिक्षा, जैविक तौर तरीकों से बागवानी आदि विषयों पर लोगों में जाकरूकता बढ़ाने हेतु अपना सक्रिय योगदान करतीं हैं। मिशेल ओबामा शक्तिशाली महिलाओं की सूचि में चोथे स्थान पर हैं।
            पांचवे स्थान पर भी अमेरिका के ही पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नि हिलेरी क्लिंटन हैं, जो 2008 में अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार थीं। उन्होंने बराक ओबामा के समर्थन में अपनी उम्मीदवारी छोड़ी। ओबामा के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद हिलेरी को सेकेट्री ऑफ स्टेट नियुक्त किया गया। इस प्रकार वह अमेरिकी इतिहास में पहली प्रथम महिलाहैं जो राष्ट्रपति केबिनेट में सेवारत हैं। हिलेरी का जीवन सफलताओं और संघर्ष का लंबा सिलसिला है। वे अराकांसास एडवोकेट्स फॉर चिल्ड्रन्स एण्ड फेम्लीस, लीगल सर्विस कारपोरेशन, रोज लॉ फर्म, वाल्मार्ट स्टोरस आदि संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत रहीं। उन्हें 19881991 में अमेरिका के 100 सबसे प्रभावशाली वकीलों में चुना गया। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आगामी वर्षों में वे अमेरिका की राष्ट्रपति चुनीं जाएं, वे सब प्रकार से इस पद के योग्य हैं ऐसा वे अपने लंबे राजनैतिक कार्यकाल साबित कर चुकीं हैं।

            नंवे स्थान पर भारतीय राजनीति की प्रमुख शख्सियत श्री मति सोनिया गांधी हैं, जो वर्तमान में यू. पी. ए. की अध्यक्षा हैं। अपने पति राजीव गांधी की हत्या से आहत सोनिया ने आरंभ में अपने बच्चों को भविष्य में किसी दुर्घटना से बचाने की दृष्टि से राजनीति में आने से साफ इंकार कर दिया था। परन्तु 1996 के आम चुनाव में कांग्रेस हार के पश्चात पूरी तरह से बिखरने की कगार पर आ गई थी। जिससे कांग्रेस के नेताओं के अत्यधिक आग्रह पर सोनिया को राजनीति में आने का फैसला करना पड़ा। सोनिया के विदेशी होने, हिन्दी व हिन्दुस्तान को न जानने, वंशवाद आदि को विपक्ष ने मुद्दा बनाकर उनका घोर विरोध किया फिर भी सोनिया के मार्गदर्शन में कांग्रेस के नेतृत्व में यू. पी. ए. की लगातार दो बार सरकार बनी। लगातार मुश्किल परिस्थितियों में अपनी संघर्ष क्षमता, दृढ़ता, व कुशलता से सोनिया गांधी आज ना सिर्फ भारत की वरन् विश्व की प्रभावशाली नेताओं में गिनी जाती हैं।


            दसंवा स्थान प्राप्त भारत की ही इंद्रा नुई पेप्सिको की अध्यक्ष व कार्यकारी निदेशक होने के साथ साथ न्यूयार्क फेडरल रिजर्व के निदेशक बोर्ड की बी स्तर की निदेशक व अंतर्राष्ट्रीय बचाव समिति के बोर्ड की भी सदस्य हैं। भारत अमेरिकी व्यापार परिषद की सभाध्यक्ष भी इन्हीं को चुना गया है। इंद्रा नुई की अहमियत को इस बात से समझा जा सकता है कि 2012 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अर्थव्यवस्था पर आये संकट को हल करने हेतु चर्चा के लिए इंद्रा नुई को आमंत्रित किया था।


            सर्वाधिक शक्तिशाली महिलाओं की सूचि में 13 वां स्थान पाने वाली जिस ओपरा विनफ्रे को आज दुनिया एक अमेरिकी मीडिया उद्घोषक, टॉक शो होस्ट, प्रोड्यूसर, लेखिका, समाज सेविका आदि के रूप में जानता है, जिस ओपरा विनफ्रे को अमेरिका की महत्वपूर्ण व लोगों को प्रभावित करने वाली जबरदस्त शख्सियत के रूप में जाना जाता है, जिस ओपरा विनफ्रे को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिए राष्ट्रपति चुनाव के दौरान सर्वाधिक जन समर्थन जुटाने वाली सेलीब्रिटी माना गया, उस ओपरा विनफ्रे के जन्म से युवावस्था तक के आरंभिक दिन बड़े कष्ट, संघर्ष व मर्मान्तक पीड़ा से भरे गुजरे। विनफ्रे का जन्म मिसिसिप्पी के एक अत्यधिक पिछड़े गाँव में एक कुवांरी माँ के यहाँ हुआ। नौ वर्ष की उम्र में विनफ्रे बलात्कार का शिकार हुईं, 14 वर्ष की उम्र में गर्भवती हुईं व उनका बच्चा गर्भ में ही मर गया, परन्तु हिम्मत न हारने वाली इस महिला ने अपनी पढ़ाई के साथ साथ रेडियो उद्घोषक के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत की और सफलता की सीढि़हाँ चढ़ना शुरु की। आज ओपरा व्यावसायिक रूप से तो सर्वाधिक सफल शख्सियतों में शुमार हैं ही समाज सेवा के क्षे़त्र में भी अग्रणी भूमिका निभातीं हैं, वर्ष 2010 में उन्होंने सर्वाधिक 4 करोड़ अमेरिकी डाॅलर दान किए। उनकी संस्था ओपरा विनफ्रे फाउंडेशन महिलाओं एवं बच्चों की बेहतरी, कुपोषण व भुखमरी मिटाने, शिक्षा आदि के क्षेत्र में कार्यरत है।


            29 वें स्थान पर बर्मा की आंग सान सू कीहैं जिन्होंने दमनकारी सैन्य शासन को उखाड़ फेंकने व लोकतंत्र की स्थापना हेतु अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया। पिछले 21 वर्षों में से 15 वर्ष उन्होंने नजर बंदी में काटे हैं। कैंसर से पीडि़त पति से उन्हें मिलने नहीं दिया गया यहाँ तक कि मृत्यु के समय भी उन्हें पति से नहीं मिलने दिया गया। उनके बच्चे भी उनसे दूर ब्रिटेन में पले बढ़े। 2008 में चक्रवात नरगिस से आई तबाही में छतिग्रस्त हुए उनके घर को मरम्मत की इजाजत नहीं दी गई। सू की के नेतृत्व में लोकतंत्र की मांग कर रही बर्मा की जनता के आंदोलन को सैन्य सरकार ने बुरी तरह कुचला, इस आंदोलन में 10000 से अधिक लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। सू की को देश छोड़कर जाने व राजनीति से दूर होने के लिए तरह तरह के प्रलोभन दिए गए पर वह टस से मस नहीं हुईं। सू की के लगातार बढ़ते राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव के चलते सैन्य सरकार को चुनावों की घोषणा करनी पड़ी। बंदी होने के बावजूद उनकी पार्टी एन एल डी ने 485 में से 392 पर विजय पाई। परंतु मिलिट्री रिजीम ने इस चुनाव परिणाम को मानने से इंकार कर दिया और सू की को 1995 तक नजर बंद करके रखा गया। सू की के लोकतंत्र की स्थापना हेतु किए गए शांतिपूर्ण संर्घष व बलिदान के लिए नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। उनका संर्घष अभी भी जारी है, उन्होंने घोषणा की है कि आगामी चुनाव में वे उम्मीदवार के रूप में खड़ी होंगी।


            37 वे स्थान पर विश्व की सर्वाधिक सुंदर महिलाओं में से एक एंजेलिना जोली, अमेरिकी अभिनेत्री, फिल्म निर्देशिका व लेखिका होने के साथ साथ प्रसिद्ध समाज सेवी भी हैं। वे संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणार्थी ऐजेंसी की सदभावना राजदूत हैं। अपने पिता जॉन वोइट के साथ बाल कलाकार के रूप में अभिनय कैरियर शुरू करने वाली एंजेलिना ने हॉलीवुड की कई महत्वपूर्ण व ख्याति प्राप्त फिल्मों में काम किया। इन्हें एक्शन भूमिकाओं के लिए खास तौर पर सराहा गया। माता पिता के वैवाहिक संबंध विच्छेद का एंजेलिना के किशोर मन पर अत्यधिक दुष्प्रभाव पड़ा जिसके चलते उनकी किशोर व आरंभिक युवावस्था मानसिक अवसाद व एकाकीपन का शिकार हुई। जिससे बाहर निकलने के लिए उन्होंने हर संभव अच्छे बुरे प्रयास किए। वे अपने साथ कई चाकू रखा करतीं थीं व अपने को धाव भी लगा लेतीं थीं, सभी तरह के नशीले ड्रग्स यहाँ तक कि हेरोइन भी उन्होंने इस्तेमाल की। जीवन के इस निराशाजनक दौर से बाहर निकलने में उन्हें अभिनय कार्य ने ही आत्मिक मार्गदर्शन दिया व इन्होंने स्वयं को सफल कलाकार के रूप में स्थापित किया।


            45 वें स्थान पर 27 वर्षीय लेडी गागा न सिर्फ फोर्ब्‍स की सूचि में स्थान बनाने वाली सबसे कम उम्र की महिला हैं वरन् वर्ष 2012-13 में 30 वर्ष से कम उम्र में सर्वाधिक कमाई करने वाली हस्तियों की सूचि में प्रथम स्थान पर रहीं। न्यूयार्क की साधारण सी बस्ती में जन्मीं लेडी गागा आज अमेरिका वा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा संचालित कई चेरेटी केम्पेनों से सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं।


            आई.सी.आई.सी.आई. बैंक की मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं प्रबंध निदेशक चंदा कोचर भारत की सबसे शक्तिशाली महिला कारोबारी व विश्व की 65 वीं सबसे शक्तिशाली महिला हैं। चंदा कोचर के नेतृत्व में आई सी आई सी आई बैंक ने जुलाई 2000 से रिटेल क्षेत्र में फायनॉन्स का काम शुरू किया और देश के प्रमुख रिटेल फायनान्सर होने का दर्जा प्राप्त किया।


            भारत की ही किरण मजूमदार शाह ने 85 वां स्थान पाने का गौरव प्राप्त किया। किरण मजूमार शाह ने मात्र 10,000 रू की पूंजी से आयरलैंड की बायोकॉन बायोकैमिकल्स लिमिटेड के साथ मिलकर बायोकॉन इण्डिया की शुरूआत की। आज इस कॅम्पनी के सर्वाधिक 40 प्रतिशत शेयर किरण के पास हैं व वह देश की सबसे धनी महिला उद्मी हैं। उद्योग एवे चिकित्सीय शोध व समाजसेवा के क्षेत्र में किरण जी के योगदान को देखते हुए भारत सरकार इन्हें पद्म श्री व पद्म भूषण से समानित कर चुकी है।
            संसार की इन सौ शक्तिशाली महिलाओं की सूचि में आठ राष्ट्राध्यक्ष, कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की सी.ई.ओ., राजनीतिज्ञ, कलाकार, लेखिका, समाजसेवी व संयुक्त राष्ट्र संघ की महत्वपूर्ण पदाधिकारी हैं। फोब्र्स के अनुसार ये महिलाएँ केवल पैसे और ताकत की दम पर इस मुकाम तक नहीं पहुँची हैं, बल्कि विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों तक अपनी पहुँच और प्रभाव बना कर इन स्थानों को हासिल कर पाईं हैं। इन महिलाओं की औसत आयु 54 वर्ष है व 42 खरब डॉलर से भी अधिक की संपत्ति पर इनका नियंत्रण है। सूचि में लेडी गागा सबसे कम उम्र की महिला हैं व 87 वर्षीय रानी एलिजाबेथ द्वित्तीय सबसे अधिक उम्र की महिला हैं। फोर्ब्‍स वुमन की अध्यक्ष एवं प्रकाशक मोइरा फोर्ब्‍स के कहे अनुसार  ‘‘फोर्ब्‍स की यह सूचि दर्शाती है कि महिलाएँ न सिर्फ विभिन्न रास्तों से सत्ता तक अपनी पहुँच बना रहीं हैं बल्कि इनमें से कुछ महिलाएँ देश का नेतृत्व कर रहीं हैं तो कुछ वर्तमान समस्याओं के समाधान हेतु रणनीति बना रहीं हैं।’’

                                                                                                           अमित प्रजापति
                                                                                                मो.न. +91 8860437682
                                                      +91 9981538208 
           
                                                                     

Monday, May 26, 2014

मानवीय सभ्यता का अर्धनारीश्वर स्वरुप


                                                 

             आधुनिक समय के बदलते परिवेश में निःसंदेह स्त्रियों के संर्वांगीण विकास ने उन द्वारों को खोला है जो सदियों से बंद रहे। कुरीतियों को परम्पराओं का चोला पहनाकर भावनात्मक, शारीरिक, आर्थिक सामाजिक हर स्तर पर समाज की आधी आबादी के साथ दमन और शोषण का जो चक्र चला (या अभी भी कमोबेश जारी है), वह मानवीय मनोवृत्ति पर नए सिरे से सोचने समझने की आवश्यकता की ओर इशारा करता है ।

             बड़े आश्चर्य की बात है कि जिस देश की संस्कृति में जीवन के चारों परम लक्ष्यों - धर्म, अर्थ, मोक्ष और काम की प्राप्ति में स्त्री-पुरुष की सहभागिता की अनिवार्यता को स्वीकार किया गया हो, उस देश में आधी आबादी के साथ इस प्रकार का भेदभाव व अमानवीय व्यवहार, कहीं न कहीं इस बात की ओर इशारा करता है कि बदलते समय के साथ स्वार्थी तत्वों ने हमारे सांस्कृतिक व जीवन मूल्यों को मनमाने ढंग से तोड़ा मरोड़ा व अपने हित साधे।

           जिस प्रकार गुण आधारित वर्णव्यस्था को वंशानुगत व जन्म आधारित जाति व्यवस्था में बदल दिया गया, जिसका भयावह परिणाम हमारा समाज आज भोग रहा है । हम देख रहे हैं कि किस प्रकार भारतीय समाज दिन पर दिन आपसी कटुता, वैमनस्य व विखराव की स्थिति में पहुँच गया है। कहाँ एक ओर भारतीय समाज में विभिन्न जातियाँ एक दूसरे के साथ आपसी सहचर्य, श्रम विनिमयता एवं प्रेम के ताने बाने में बुनी थीं, वही आज एक दूसरे के साथ शत्रुवत् व्यवहार कर रहीं हैं।

          ठीक उसी प्रकार हमारे मनीषियों द्वारा कहे कथन, "आत्मा का कोई लिंग नहीं होता" इस बात को भूलकर शारीरिक आधार पर स्त्री पुरुष के साथ भेदभाव करने की प्रवृत्ति ने सती प्रथा, दहेज प्रथा, स्त्रियों को शिक्षा से वंचित रखना, भ्रूण हत्या आदि कई कुरीतियों द्वारा हमारी गरिमामयी संस्कृति को विश्व भर में कलंकित किया बल्कि हमारे समाज को पिछड़ेपन की गर्त में पहुँचा दिया। स्वार्थी तत्वों द्वारा जीवन और सांस्कृतिक मूल्यों की मनमानी व्याख्या कर अपना वर्चस्व कायम रखने की प्रवृत्ति के चलते ही सारे विश्व में अपना परचम लहराने वाली हमारी संस्कृति दयनीय अवस्था में चली गयी।

         चाणक्य का एक कथन याद आता है जिसमें उनहोंने कहा था कि यदि हम स्त्री को अशिक्षित व कमजोर करते हैं तो हम अपने समाज को पंगु बना लेते हैं। शायद चाणक्य ने स्त्रियों के प्रति पनप रही विकृति को भांप लिया होगा तभी उन्होंने आगे आने वाले दुष्परिणामों के प्रति समाज को आगाह किया होगा। जैसे जैसे यह विकृति बढ़ती गई भारतीय समाज पतन की ओर बढ़ता गया।

         हमारे देश में प्रतिभाशाली, प्रभावशाली, ओजस्वी, कालजयी एवं विदुषि महिलाओं की जैसी लंबी व सतत् श्रंखला है वैसी किसी और देश, संस्कृति में नहीं मिलती। जहाँ एक ओर हमारे धर्म ग्रन्थों में अनुसुइया, तारा, अरुन्धती, ब्रह्मवादिनी गार्गी, कैकई, सीता, शबरी, दमयंती, माता यशोदा, द्रौपदी, राधा, मैत्रेयी, सावित्री आदि प्रभावशाली महिलाओं का वर्णन मिलता है, वहीं हमारा इतिहास यशोधरा, रानी दुर्गावती, रानी रुपमति, मीराबाई, जीजाबाई, रजिया सुल्तान, चांद बीबी, अक्का महादेवी आदि जैसी न जाने कितनी महिलाओं की यशोगाथाओं से भरा पड़ा है, जिन्होंने न केवल अपने तत्कालीन समाज को प्रभावित व दिशा निर्देशित किया बल्कि आज भी प्रेरणा स्त्रोत बनी हुई हैं।

         भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी असंख्य महिलाओं ने सामाजिक विषमताओं और दुष्वारियों के बावजूद पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर आजादी की लड़ाई को धारदार बनाया। महारानी लक्ष्मीबाई, कस्तूरबा गांधी, सरोजनी नायडू, विजया लक्ष्मी पंडित, सुचेता कृपलानी, लक्ष्मी सहगल, प्रीतिलता वाडेकर, भिकाजी कामा, राजकुमारी अमृत कौर, अरुणा आसिफ अली आदि महिलाओं के अविस्मरणी योगदान को कौन नहीं जानता। इसके साथ ही महादेवी वर्मा, इंदिरा गांधी, लतामंगेश्कर, आशा भोंसले, कल्पना चावला, पुनीता अरोड़ा, अमृता शेरगिल, अंजोली इला मेनन, एम॰ एस॰ सुब्बु लक्ष्मी, पी॰ टी॰ उषा,सुष्मिता सेन, सायना नेहवाल, आदि कई विदुषी महिलाओं के उत्कृष्ट व चमत्कारिक योगदान के बिना आधुनिक प्रगतिशील भारतीय समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

         कहने का तात्पर्य कि किसी भी सदी में, समय की धारा व सामाजिक परिस्थितियाँ कितनी भी प्रतिकूल क्यों न रहीं हों महिलाओं ने अपनी प्रतिभा, कर्मठता, लगन और साहस से समय के हर पन्ने पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। यहाँ एक बात यह भी ध्यान रखने योग्य है कि माँ, बहन, पत्नि, प्रेमिका एवं दोस्त के रुप में भी स्त्री सदैव पुरुष की प्रेरणा व प्रेरक रही है। इसी लिए कहा भी जाता है कि प्रत्येक सफल व्यक्ति की सफलता में एक महिला का योगदान होता है। पुरुष की सहयोगिनी और प्रेरक के रुप में मूक दायित्व निर्वहन के साथ साथ उसके मानवीय सभ्यता को दिए गए व्यक्तिगत योगदानों को भी ध्यान में रखकर ही शायद हमारी संस्कृति में स्त्री को अति सम्मान की दृष्टि से देखा गया और कहा गया कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता“ । यहाँ तक कि माँ को ही प्रथम गुरु भी कहा गया।

         पिछले कई दशकों से स्त्रियों के साथ हो रहे शोषण व अत्याचार के खिलाफ समाज में जागृति आई है, जिसके चलते संविधान एवं सामाजिक स्तर पर स्त्रियों के पक्ष में माहोल बना है। नए परिवेश की अनुकूलता में स्त्रियाँ तेजी से उन्नति की ओर अग्रसर हई हैं। विभिन्न परीक्षाओं में छात्राओं की सफलता का प्रतिशत छात्रों से बेहतर होता है। सेना, पुलिस, अंतरिक्ष, प्रशासनिक सेवा, राजनीति, व्यावसायिक प्रबंधन आदि कई ऐसे क्षेत्र जो पहले स्त्रियों के अनुकूल नहीं समझे जाते थे, वहाँ स्त्रियाँ आज पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहीं हैं।

         शिक्षा एवं आर्थिक आत्म निर्भरता से समाजिक परिदृश्य में स्त्री की स्थिति दिन पर दिन सुदृढ़ हुई है। आज की स्त्री अपने जीवन से संबंधित सभी फैसले अपनी रुचि एवं समझ के अनुरुप करती है। हालांकि यह भी सही है कि परिवर्तन की यह बयार अभी मेट्रो वा बड़े शहरों तक ही पहुँची है, छोटे कस्बों खास कर ग्रामीण स्तर पर स्त्रियों के हालात अभी भी दुष्वारियों से भरे हैं, परन्तु परिवर्तन की यह लहर वहाँ तक भी पहुँचना ही है। तभी एक ऐसा समाज जो स्त्री पुरुष में समानता का व्यवहार करता हो, वो पनपे और आदर्श सभ्यता साकार रुप ले सके।

         ऐतिहासिक और तात्कालिक समाज पर अगर हम नजर डालें तो जैसा पुरुष प्रधान समाज हमें नजर आता है, क्या यह संभव है कि कभी स्त्री प्रधान समाज भी रहा हो ? हिमाचल प्रदेश की कुछ जनजातियों में आज भी स्त्री ही कर्ता धर्ता होती है। यहाँ तक कि स्त्रियों के बहुविवाह भी देखने में आते हैं। महाभारत में भी द्रौपदी के पाँच पति होने का प्रसंग सर्वज्ञ है। बहुत संभव है कि कभी स्त्री प्रधान समाज रहा हो, परन्तु जैसा राजनीति का नियम है कि सारा साहित्य, दर्शन, प्रथाएँ वा परम्पराएँ वर्चस्वमान के हितों के अनुरुप गढ़ी जाती हैं, उसी प्रकार पुरुष प्रधान समाज ने स्त्री प्रधान समाज के चिन्ह मिटा दिए हों।

         एक बात समझने जैसी है कि मनुष्य की मनोवृत्ति अहं के इर्द गिर्द सत्ता के ताने बाने रचता है। मनुष्य अपने अहं को तृप्त करने के लिए भेदों के आडम्बर रचता है व उन्हें वास्तविकता के चोले पहनाने की कोशिश करता है। चाहे वह भेद - धर्म, जाति, रंगभेद, भाषा, भौगोलिकता या लिंग किसी भी आधार पर क्यों न रचे जाएँ।

         इन भेदों के आधार पर खड़े शासन वा समाज से पीडि़त पक्ष, कभी ना कभी बगावत जरुर करता है और फिर पीडि़त - शासक बन जाते हैं और शासक - पीडि़त। इस प्रकार समय के चक्र के साथ कभी एक पक्ष ऊपर तो कभी दूसरा पक्ष, परन्तु इस प्रतिस्पर्धा में समाज से अत्याचार और शोषण मिट नहीं पाता। अतः आवश्यकता इस बात की है कि कुरीतियों, भेदभावों, अत्याचारों वा शोषण मिटाने के लिए जो भी बदलाव हो वो धर्म, जाति, रंग, भाषा, लिंग आदि भेदभावों से ऊपर उठ कर न्याय, समता, योग्यता, समरसता आदि रचनात्मक आधारों पर किए जाएँ। हमारी शासन, सामाजिक व न्याय व्यवस्थाएँ ऐसी हों कि समस्त नागरिकों (स्त्री-परुषों) में आपसी साहचर्य, एक दूसरे के प्रति सम्मान, प्रेम, समता, आपसी सहयोग आदि सद्भाव के साथ साथ समाज एवं देश में सुरक्षा और निर्भयता विकसित हों। एक ऐसा समाज जिसमें स्त्री-पुरुष के सामाजिक, सांसारिक वा आध्यात्मिक संबंधों के ताने बाने - परस्पर सहचर्य, समता वा सामंजस्य के अर्धनारीश्वर स्वरुप को प्रकट रुप दे पाएँ।

Sunday, July 14, 2013


आडवाणी के बिना भाजपा
आडवाणी जी का स्‍तीफा देना और वापस लेना दोनों ही घटनाओं ने ना सिर्फ भारतीय बल्कि अंतर्राष्‍ट्रीय राजनैतिक विचार मानस को मथ दिया । दोनों ही स्थितियों पर तरह तरह के कयास लगाए गए और लगाए जा रहे हैं और ऐसा हो भी क्‍यों ना, 1984 में 2 सीट जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी को 1986 से 1991 तक के अपने अध्‍यक्ष काल में 182 सीट जीतने वाली राष्‍ट्रीय पार्टी बना दिया । तभी तो भाजपा के श्री शत्रुघ्‍न सिन्‍हा ने आडवाणी जी के स्‍तीफा देने के बाद कहा कि आडवाणी जी के बिना भाजपा की कल्पना नहीं की जा सकती और पार्टी को इस उंचाई तक पहुंचाने वाले ऐसे व्यक्ति के बिना पार्टी के कई नेताओं को पहले जैसे उत्साह के साथ काम करने में कठिनाई होगी. सन् 1951 में डाक्‍टर श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की तब से 1957 तक आडवाणी पार्टी सचिव वा सन् 1973 से 1977 तक भारतीय जनसंघ के अध्‍यक्ष रहे । इसी दौरान 1975 में आपातकाल के दौरान वे 19 महीने जेल में भी रहे । सन् 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्‍थापना के बाद से 1986 तक आडवाणी पार्टी के महासचिव रहे । 1986 से 1991 तक के अपने अध्‍यक्ष काल के दौरान 1990 में सोमनाथ से अयोध्‍या तक रथयात्रा के दौरान उनकी गिराफ्‍तारी ने उनक कद वा लोकप्रियता को बढ़ा दिया । सन् 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जिन लोगों को अभियुक्त बनाया गया था उनमें आडवाणी का नाम भी शामिल है। लालकृष्ण आडवाणी तीन बार भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद पर रह चुके हैं साथ ही चार बार राज्यसभा के और पांच बार लोकसभा के सदस्य रहे । सन् 1977 से 1979 तक पहली बार केंद्रीय सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में लालकृष्ण आडवाणी सूचना प्रसारण मंत्री रहे। लालकृष्ण आडवाणी सन् 1999 में एनडीए की सरकार में अटलबिहारी वाजपेयी के नेत़ृत्व में केंद्रीय गृहमंत्री बनाए गए और फिर इसी सरकार में उन्हें 29 जून, 2002 को उपप्रधानमंत्री पद का दायित्‍व सौंपा गया। वर्तमान में वो गुजरात के गांधीनगर संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के सांसद हैं वा एन डी ए की संसदीय दल के नेता हैं । कहने का तात्‍पर्य भारतीय जनता पार्टी के इतने अभिन्‍न अंग रहे श्री लाल कृष्‍ण आडवाणी के बिना क्‍या भारतीय जनता पार्टी की कल्‍पना की जा सकती है । जिस आडवाणी को पार्टी का लौह पुरुष कहा जाता हो क्‍या वह पद के मोह में या अपनी ही पार्टी के सदस्‍य से राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के चलते स्‍वयं की वा पार्टी की साख को मटिया मेट कर सकता है । क्‍या आडवाणी जैसा रानीतिज्ञ इतनी बडी गल्‍ती कर सकता है कि उसके पार्टी को लिखे गए त्याग पत्र के पोस्‍टर दिल्‍ली में लग जाए जिसमें लिखा हो कि -मुझे नहीं लगता कि अब यह वही पार्टी रह गई है जो डॉ. मुखर्जी, दीनदयाल जी, नाना जी और वाजपेयी जी ने बनाई थी, जिसकी एकमात्र चिंता देश और उसके लोग थे। ज्यादातर लोग अब अपने निजी एजेंडे को आगे बढ़ाने में लगे हैं। कुछ ऐसा ही हंगामा आडवाणी की सन् 2006 में पाकिस्तान यात्रा के दौरान जिन्ना की मजार पर जिन्‍ना को धर्मनिरपेक्ष कहे जाने पर हुआ था । आण्‍वाणी द्वारा जिन्‍ना को धर्मनिरपेक्ष कहे जाने का मामला हो या नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी की चुनाव प्रचार समिति का अध्‍यक्ष बनाए जाने पर सभी महत्‍वपूर्ण पदों से त्‍याग पत्र देने का मसला इन दोनों बातों का एक दूरगामी परिणाम यह हो सकता है कि चुनाव में भा ज पा नरेंद्र मोदी की आक्रमक छवि का फायदा ज्‍यादा से ज्‍यादा उठा सके और ज्‍यादा सीटें हसिल कर सके । अगर बहुमत मिला तो ठीक नहीं मिला तो फिर गठबंधन सरकार बनाते समय आडवाणी के नेतृत्‍व में फिर मिली जुली सरकार का निर्माण किया जा सके । क्‍योंकि यह नहीं भूला जाना चाहिए कि जिस तरह की हिंदूवादी छवि आज नरेंद्र मोदी की है इसी तरह की छवि किसी जमाने में खास तौर पर जिन्‍ना को धर्मनिरपेक्ष कहने के पहले आडवाणी की हुआ करती थी । इन सारे घटना क्रमों को आडवाणी का भारतीय जनता पार्टी के प्रति गहरे समर्पण के रूप में भी देखा जा सकता है कि पार्टी हित में उन्‍होंने अपनी छवि वा हितों को भी दांव पर लगा दिया । वास्‍तव में आडवाणी के बिना भारतीय जनता पार्टी के स्‍वरूप की कल्‍पना भी नहीं की जा सकती ।

Friday, December 3, 2010

हमारी उड़ान


जीवन अनंत संभावनाओं का आकाश है ,
जीवन बहुरंगी रंगों का केन वास है ,
जीवन बहुआयामी विस्‍तार सा फैला है
हमारी कल्‍पनाओं के पंख हमें फड़फड़ाना है
हमें नित नये द्वार खट खटाने हैं
हमें जीना है जीवन उत्‍साह में उमंग में
हमें गिरना है, संभलना है, फिर आगे बढ़ना है
हम सभी रंगों के रंग में रंग जायेंगे
हम सभी संभावनाओं की अनंतता को पार कर जायेंगे
हम खंगाल डालेंगे विस्‍तृत आयामों को
और ये सब हम करेंगे खेल खेल में, हंस कर मुस्‍कुरा कर
तुतलाकर , छेड़ते हुए इक दूसरे को
और ये सब पलक झपकते हुए हो जायेगा , तुम देखना ......:))

Thursday, October 28, 2010

पड़ाव

देखता हूँ, जिधर भी
आता है नजर, जो भी
चाहे, वो जीवित हो, अजीवित हो
पत्‍थर हो, पहाड़ हो मनुष्‍य हो, पशु हो
धरती हो, अंतरिक्ष हो
या कुछ भी
एक व्‍यक्तित्‍व सा छलकता
नजर आता है ।

हर व्‍यक्तित्‍व का, अपना
एक निराला,
स्‍थाई भाव !
कुछ विशेष कथा सुनाता सा
कुछ भिन्‍न यात्रा संस्‍मरण सा कहता नजर आता है ।
यूँ तो सभी जीवित, अजीवित
तात्‍कालिक संदर्भों पर
प्रतिक्रिया प्रकट करते नजर आते हैं ।

कभी हंसी, मुस्‍कुराहट कभी
कभी रोष, असहमति भी
कभी व्‍यंग, कभी मौन
कभी नृत्‍य, गुनगुनाहट कभी
मानो !
व़ैश्विक परिवार के सदस्‍यों का संवाद हो ।

परन्‍तु, इन सभी व्‍यक्तित्‍वों
के संचारी भाव के पीछे स्‍थाई भाव अनवरत् है ।
यह स्‍थाई भाव !
हर एक के,
भिन्‍न भिन्‍न व्‍यक्तित्‍वों का
असामान्‍य सा निराला वयक्तित्‍व
व्‍यतीत किए गए
देश काल परिस्थितियों में
तय किए गए मार्गों में
उड़ने वाली धूल कणों से
धूप, वायु, वर्षा द्वारा
किया गया श्रृंगार ही तो है ।

याने, ये स्‍थाई भाव भी
लम्‍बे समय अंतराल की,
कृतिमताओं की परत दर परत ही हैं
जो अपनी बोझिलता से
स्‍थाई नजर आता है ।

अब या तो, हम, अपने बोझ ! की बोझिलता बढ़ाते जाऍं
या इस बोझ को छोड़कर
निर्मल, निर्लिप्‍त, सुगम
प्रभाह युक्‍त निर्भार, निराकार हो जाऍं ।

यह चयन, हम
पर ही तो निर्भर है ।

अमित प्रजापति
mo. +919981538208
190, चित्रांश भवन, राजीव नगर, विदिशा (म .प्र .)
पिन – 464001
Email – amitpraj@in.com
amitprajp@gmail.com

Sunday, February 7, 2010

विचारात्‍मक आतंकवाद

शाहरूख खान द्वारा IPL में पाकिस्‍तानी खिलाड़ियों की वकालत और उसके बाद अपने आप को सही ठहराये जाने की जिद यह दर्शाती है कि उन्‍हें भारत और भारतीयों के जख्‍मों से ज्‍यादा मतलब नहीं है । शिवसेना और बालठाकरे का शाहरुख खान मामले में प्रतिक्रिया का तरीका गलत हैयह बात भी अपनी जगह सही है पर इससे शाहरुख खान की गलती पर भी पर्दा नहीं पड़ सकता ।
भारत में आने वाली नकली करेंसी की बात हो, आतंकवादियों को प्रशिक्षण से लेकर आतंकवादी घटनाओं को क्रियांवित करने तक की पूरी प्रक्रिया में पाकिस्‍तानी संलिप्‍तता की बात हो, मुंबई स्‍टॉक एक्‍सचेंज बिल्डिंग बम धमाका, 26/11 मुंबई बम धमाके और संसद पर हमला जैसे भारत की अर्थव्‍यस्‍था और स्‍वाभिमान को नष्‍ट करने की बात हो, इन सभी दुर्घटनाओं के बावजूद यदि कोई व्‍यक्ति पाकिस्‍तान और पाकिस्‍तानी खिलाड़ियों से इतनी शिद्दत से प्रेम दिखाए तो उसकी देशभक्ति संदेह के घेरे में आती है । भले ही वो शाहरुख हों, शशिथरुर हों या चिदम्‍बरम् हों । इस देश का दुर्भाग्‍य यह हो गया है कि देश में भ्रष्‍ट व्‍यक्तियों का कद इतना बड़ गया है कि वो अपने आप को देश से भी बड़ा समझने लगे हैं और वे अपने व्‍यक्तिगत् कद और उप‍लब्धियों में विस्‍तारके लिए अपनी घटिया, स्‍वार्थी और देशद्रोहात्‍मक सोच का क्रियान्‍व्‍यन और प्रदर्शन खुलेआम, बेशर्मी और ढ़ीठता से करते हैं क्‍योंकि उन्‍हें पता है कि आज आम भारतीय या भारत के प्रति प्रेम रखने वाला कोई भी भारतीय उन्‍हें नुकसान पहुँचाने की स्थिति में नहीं है । शाहरुख खान द्वारा IPL में पाकिस्‍तानी खिलाड़ियों की वकालत एक अलग मुद्दा है और शिवसेना की अलगाव वादी दादागिरी एक अलग समस्‍या पर इतनी सफाई के साथ एक पूरा तंत्र सिर्फ शिवसेना और बाल ठाकरे को दोषी ठहराकर शाहरूख खान को सहानु‍भूति दिलवाने में जुटा है, इससे यह पता चलता है कि भारत पर भारतियों की पकड़ कितनी ढ़ीली हो चुकी है ।
बॉलीबुड में एक पूरा वर्ग हमेशा से सक्रिय रहा है जो कला की स्‍वतंत्रता, अभिव्‍यक्ति की आजादी, मानव अधिकारों के नाम पर आतंकवादियों और पाकिस्‍तान के प्रति सहानुभूति दर्शाता रहा है और देश के प्रति बलिदान देने वाली सेना और व्‍यवस्‍था को कटघरे में खड़ा करता रहा है । गुलजार की माचिस, शाहरुख की मैं हूँ ना, आमिर की फना जैसी कितनी ही फिल्‍मों में आतंकवादियों के मानवीय पहलू दिखाते हुए उनके प्रति संवेदनाऍं और सहानुभूति इकट्ठा करने की कोशिश की जाती है और पाकिस्‍तान और आतंकवादियों के प्रति कठोरता से पेश आने के दृष्टिकोण की निंदा की जाती है । आखिर किस तरह की सोच को हम अपने देश में लोकतंत्र, अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता, मानवाधिकारों और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर झेलते हुए देश की मर्यादा और सुरक्षा को चोट पहुँचाने वालों को बढ़ावा देते हैं । कल तक जो महेश भट्ट पाकिस्‍तान से अच्‍छे संबंधों की वकालत करते थे । पूरी दुनिया में कला के आदान प्रदान के लिए सिर्फ उन्‍हें पाकिस्‍तान ही नजर आता था । अब उनके बेटे का नाम 26/11 मुंबई बम धमाके के मुख्‍य आरोपी के साथ आता है तो वह अपने बेटे को सुरक्षा एजेंसियों की जॉंच पूरी होने के पहले ही प्रेस कांफ्रेंस बुला - बुलाकर निर्दोष होने की घोषणा करते नहीं थकते हैं । वहीं दूसरी ओर मुस्लिम तुष्‍टीकरण की नीति पर चलने वाली सरकार भी मामले में लीपा पोती करवाती है । बाम्‍बे स्‍टॉक एक्‍सचेंज बिल्डिंग में हुए धमाकों में भी आरोपी आतंकवादियों के साथ संजय दत्‍त की लिप्‍तता सारे देश को पता है परन्‍तु जब भी संजय पर कानूनी कार्यवाही का शिकंजा कसाता है तो मीडिया में संजय दत्‍त के प्रति सहानुभूति की लहर पैदा करने की कोशिश की जाती है ।
देश विदेश की जानी मानी लेखिका अरून्‍धती रॉय के लेख आए दिन बड़े बड़े पत्र पत्रिकाओं में छपते रहते हैं । जिनमें सेना के द्वारा कश्‍मीर में होने वाले मानवाधिकारों के उल्‍लंघन का मुद्दा उठाती रहतीं हैं और स्‍वतंत्र कश्‍मीर की मांग को समर्थन देती रहतीं हैं । कैसे उनके भारती विरोधी विचार बिना किसी बाधा के प्रकाशित होते रहते हैं ? यह देखने वाला तंत्र इस देश में नजर नहीं आता । इन तमाम भरत विरोधी विचारों के प्रसार को रोकने और प्रतिरोध करने का न तो समय भारत के बुद्धिजीवियों के पास हैऔर न ही उनमें ऐसी कोई इच्‍छा और इच्‍छा शक्ति नजर आती । इससे बड़ा और क्‍या देश का दुर्भाग्‍य होगा ?
जिस तरह से एक आतंकवादी विस्‍फोकों और हथयारों से देश की जनता, धन-संपत्ति, सुरक्षा स्‍वाभिमान और प्रतिष्‍ठा को नुकसान पहुँचाते हैं उसी तरह से बल्कि कहना चहिए उससे भी ज्‍यादा शाहरूख, संजय और अरुन्‍धती रॉय जैसे लोग ग्‍लेमर कला और साहित्‍य की चाशनी में लपेट कर प्रत्‍यक्ष आतंकवाद से भी ज्‍यादा नुकसान पहुँचाते हैं और देश की जड़ों को दीमक की तरह भीतर ही भीतर धीमे धीमे खोखला करते हैं । आतंकवादी तो फिर एक बार सेना और सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर आ जाते हैं पर जब तक कलात्‍मक, संस्‍कृतिक साहित्यिक और ऱाजनेतिक आतंकवादियों को निशान पर नहीं लिया जाता देश की सुरक्षा व्‍यवस्‍था में सेंध लगती रहेगी इसके लिए पहले तो आम भारतवासियों को जागरूक व सक्रिय होना होगा ।

Tuesday, November 17, 2009

दान की सात मर्यादाएँ

ज्‍योतिष और धर्म में दान का विशेष महत्‍व है दान की महिमा का वर्णन करते हुए हिन्‍दु धर्म ग्रन्‍थों में बहुत विस्‍तार से लिखा गया है। ज्‍योतिषीय दृ‍ष्टि से जब जन्‍म कुण्‍डलियों का आंकलन करते हैं तो कई बार देखने में आता है कि पूर्व जन्‍मों में जाने अनजाने में किए गए दुष्‍कर्मों के फलस्‍वरूप जब ग्रह दूषित हो कर कुप्रभाव दिखाते हैं और जीवन दुष्‍कर हो जाता है। ऐसे में प्रायश्चित स्‍वरूप अलग- अलग प्रकार के दान का विधान बताया है जैसे शनि ग्रह के लिए तेल में छाया दान, अलग- अलग ग्रहों से संबंधित द्रव्‍यों व धातुओं का दान इत्‍यादि। न सिर्फ प्रारब्‍ध के दुष्‍कर्मों के कुप्रभावों के निवार्णार्थ प्रायश्चित स्‍वरूप दान का महत्‍व है बल्कि भविष्‍य में आने वाले जीवन को सुखमय एवं आध्‍यात्मिक व भौतिक उन्‍नति हेतु भी पुण्‍य संचय की दृष्टि से भी विभिन्‍न प्रकार के दान का महत्‍व बताया गया है।
दान व्‍यवस्‍था पूर्व जन्‍मों में की गई त्रुटियों के फलस्‍वरूप होने वाले कुप्रभावों की शांति कर भौतिक व आध्‍यात्मिक उन्‍नति का मार्ग प्रशस्‍त करती है, वैचारिक रूप से व्‍यक्ति को सुदृढ़ बनाती है व व्‍यक्ति को सामाजिक कर्त्‍तव्‍य पालन के प्रति जागरूक करती है। मानवता के विकास में सहायक दान प्रक्रिया का स्‍वार्थी तत्‍वों द्वारा संकीर्ण व स्‍वार्थी विवेचन कर धन लिप्‍सा पूर्ति व कुत्सित कर्मों को करने व छिपाने का साधन बनाने का प्रयास किया गया जिससे इस प्रक्रिया के प्रति आम जनता में अविश्‍वास व विभ्रम की स्थिति पैदा हो गई।
इसी विभ्रम व अविश्‍वास के समाधान हेतु परम् विष्‍णु भक्‍त श्री नारद मुनि द्वारा एक श्‍लोक की विवेचना स्‍कन्‍द पुराण में वर्णित है। कथानुसार सौराष्‍ट्र के राजा धर्मवर्मा को कई वर्षों की तपस्‍या के बाद आकाशवाणी द्वारा श्‍लोक कहा गया –
द्विहेतु षडधिष्‍ठानं षडङ व़ द्विपाकयुक्। चतुष्‍प्रकाटं त्रिविधं त्रिनाशं दानमुच्‍यते।। दान के दो हेतु, छः अधिष्‍ठान, छः अंङ दो प्रकार के परिणाम्, चार प्रकार, तीन भेद और तीन विनाश साधन हैं, ऐसा कहा जाता है।
इस श्‍लोक की व्‍याख्‍या करते हुए नारद जी ने कहा है दान का थोड़ा होना या बहुत होना अभ्‍युदय का कारण नहीं होता, अपितु श्रद्धा और शक्ति के बिना किए कए दान से भला नहीं हो सकता और दान भी नहीं माना जाएगा। इनमें से श्रद्धा के विषय में यह श्‍लोक है। यदि को श्रद्धा के बिना अपना जीवन भी निछावर कर दे तो भी वह उसका कोई फल नहीं पाता; इसलिए सबको श्रद्धालु होना चाहिए। श्रद्धा से ही धर्म का साधन किया जाता है धन की बहुत बड़ी राशि से नहीं। देहधारियों में उनके स्‍वभाव के अनुसार श्रद्धा तीन प्रकार की होती है- सात्विकी, राजसी और तामसी। सात्विकी श्रृद्धा वाले पुरुष देवताओं की पूजा करते हैं, राजसी श्रृद्धा वाले लोग यक्षों और राक्षसों की पूजा करते हैं तथा तामसी श्रृद्धा वाले मनुष्‍य प्रतों भूतों और पिशाचों की पूजा किया करते हैं। इसलिए श्रृद्धावान पुरुष अपने न्‍यायोपार्जित धन का सत्‍पात्र के लिए जो दान करते हैं वह थोड़ा भी हो तो भगवान प्रसन्‍न हो जाते हैं।
शक्ति के विषय में श्‍लोक इस प्रकार से है- कुटुम्‍ब के भरण पोषण से जो अधिक हो, वही दान करने योग्‍य है। उसी से वास्‍तविक धर्म का लाभ होता है। यदि आत्‍‍मीय जन दु:ख से जीवन निर्वाह कर रहे हों तो उस अवस्‍था में किसी सुखी और समर्थ पुरुष को दान देने वाला धर्म के अनुकूल नहीं प्रतिकूल चलता है। जो भरण पोषण करने योग्‍य व्‍यक्तियों को कष्‍ट देकर किसी मृत व्‍यक्ति के लिए बहूव्‍यवसाध्‍य श्राद्ध करता है तो उसका किया हुआ वह श्राद्ध उसके जीते जी अथवा मरने पर भी भविष्‍य में दु:ख का ही कारण होता है। जो अत्‍यंत तुच्‍छ हो अथवा जिस पर सर्वसाधारण का अधिकार, वह वस्‍तु ‘सामान्‍य’ कहलाती है, कहीं से मांगकर लायी वस्‍तु गई वस्‍तु को ‘याचित’ कहते हैं, धरोहर का ही दूसरा नाम ‘न्‍यास’ है बन्‍धक रखी हुई वस्‍तु को ‘आधि’ कहते हैं, दी हुई वस्‍तु ‘दान’ के नाम से पुकारी जाती है, दान में मिली हुई वस्‍तु को ‘दान धन’ कहते हैं, जो धन एक के यहॉं धरोहर रखा गया हो और रखने वाले ने उसे पुन: दूसरे के यहॉ रख दिया हो उसे ‘अन्‍वाहित’ कहते हैं, जिसे किसी के विश्‍वास पर किसी के यहॉ पर छोड़ दिया जाए वह धन ‘निक्षिप्‍त’ कहलाता है, वंशजों के होते हुए भी सब कुछ दूसरों को दे देना ‘सान्‍वय सर्वस्‍व दान’ कहा गया है। विद्वान पुरुष को चाहिए कि वे आपत्ति काल में भी उपर्युक्‍त नव प्राकर की वस्‍तुओं का दान न करें। जो पूर्वोक्‍त नव प्राकर की वस्‍तुओं का दान करता है, वह मूढ़चित्‍त मानव प्रायश्चित का भागी होता है।
इस प्रकार दान के दो हेतु श्रृद्धा और शक्ति के बाद दान के छ: अधिष्‍ठानों का वर्णन करते हुए श्री नारद जी कहते हैं- धर्म, अर्थ, काम, लज्‍जा, हर्ष, और भय ये दान के छ: अधिष्‍ठान कहे जाते हैं। सदा ही किसी प्रयोजन की इच्‍छा न रखकर केवल धर्म बुद्धि से सुपात्र व्‍यक्तियों को दान दिया जाता है तो उसे ‘धर्म दान’ कहते हैं। मन में कोई प्रयोजन रखकर ही प्रसंग वश जो कुछ दिया जाता है उसे ‘अर्थ दान’ कहते हैं, वह इस लोक में ही फल देने वाला होता है। स्‍त्री समागम, सुरापान, शिकार और जुए के प्रसंग में अनधिकारी मनुष्‍यों को प्रयत्‍नपूर्वक जो कुछ दिया जाता है, वह ‘काम दान’ कहलाता है। भरी सभा में याचकों के मांगने पर लज्‍जावश देने की प्रतिज्ञा कर जो दिया जाता है वह ‘लज्‍जा दान’ माना गया है। कोई प्रिय कार्य देखकर अथवा प्रिय समाचार सुनकर हर्षोल्‍लास से जो कुछ दिया जाता है उसे ‘हर्ष दान’ कहते हैं। निन्‍दा, अनर्थ और हिंसा का निवारण करने के लिए अनुपकारी व्‍यक्तियों को विवश होकर जो कुछ दिया जाता है, उसे ‘भय दान’ कहते हैं।
दान के छ: हैं- अंग दाता, प्रतिग्रहीता, शुद्धि, धर्मयुक्‍त देय वस्‍तु, देश और काल। दाता निरोग, धर्मात्‍मा, देने की इच्‍छा रखनेवाला, व्‍यसन रहित, पवित्र तथा सदा अनिन्‍दनीय कर्म से आजीविका चलानेवाला होना चाहिए। इन छ: गुणों से दाता की प्रशंसा होती है। सरलता से रहित, श्रद्धाहीन, दुष्‍टात्‍मा, दुर्व्‍यसनीय, झुठी प्रतिज्ञा करने वाला तथा बहुत सोने वाला दाता तमोगुणी और अधम माना गया है। जिसके कुल, विद्या और आचार तीनों उज्‍ज्‍वल हों, जीवन निर्वाह की वृत्ति भी शुद्ध और सात्विक हो, जो दयालु जितेंद्रिय तथा योनि दोष से मुक्‍त हो वह ब्राह्मण दान का उत्‍तम पात्र (प्रतिग्रह का उत्‍तम अधिकारी) कहा जाता है। याचकों को देखने पर सदा प्रसन्‍न मुख हो उनके प्रति हार्दिक प्रेम होना, उनका सत्‍कार करना तथा उनमें दोष दृष्टि न रखना ये सब सद्गुण दान में शुद्धि कारक माने गए हैं। जो धन किसी दूसरे को सता कर न लाया गया हो, अतिक्‍लेश उठाये बिना अपने प्रयत्‍न से उपार्जित किया गया हो, वह थोड़ा हो या अधिक हो, वही देने योग्‍य बताया गया है। किसी के साथ कोई धार्मिक उद्देश्‍य लेकर जो व़स्‍तु दी जाती है, उसे धर्मयुक्‍त देय कहते हैं। यदि देय वस्‍तु उक्‍त विशेषताओं से शून्‍य हो तो उसके दान से कोई फल नहीं होता। जिस देश अथवा काल में जो- जो पदार्थ दुर्लभ हो, उस- उस पदार्थ का दान करने योग्‍य वही- वही देश और काल श्रेष्‍ठ है। इस प्रकार ये दान के छ: अंग बताये गये हैं। महात्‍माओं ने दान के दो फल बताये हैं। उनमें से एक तो परलोक के लिए होता है और एक इहलोक के लिए। श्रेष्‍ठ पुरूषों को जो कुछ दिया जाता है, उसका परलोक में उपभोग होता और असत् पुरूषों को जो कुछ दिया जाता है, वह दान यहीं भोगा जाता है। ध्रुव, त्रिक, काम्‍य और नैमित्तिक – इस क्रम से द्विजों ने वैदिक दान मार्ग को चार प्रकार का बतलाया है। कुआ बनवाना, बगीचे लगवाना तथा पोखरे खुदवाना आदि कार्यों में जो सबके उपयोग में आते हैं, धन लगाना ‘ध्रुव’ कहा गया है। प्रतिदिन जो कुछ दिया जाता है, उस नित्‍य दान को ही ‘त्रिक’ कहते हैं। सन्‍तान, विजय, एश्‍वर्य, स्‍त्री और बल आदि के निमित्‍त तथा इच्‍छा की प्राप्ति के लिए जो दान किया जाता है, वह ‘काम्‍य’ कहलाता है। ‘नैमित्तिक दान’ तीन प्रकार का बतलाया गया है। वह होम से रहित होता है। जो ग्रहण और संक्रान्ति आदि काल की अपेक्षा से दान किया जाता है, वह ‘कालापेक्ष नैमित्तिक दान’ है। श्राद्ध आदि क्रियाओं की अपेक्षा से जो दान किया जाता है वह ‘क्रियापेक्ष नैमित्तिक दान’ है तथा संस्‍कार और विद्या – अध्‍ययन आदि गुणों की अपेक्षा रखकर जो दान दिया जाता है, वह ‘गुणपेक्ष नैमित्तिक दान’ है। इस प्रकार दान के चार प्रकार बतलाये गये हैं। अब उसके तीन भेदों का प्रतिपादन किया जाता है। आठ वस्‍तुओं के दान उत्‍तम माने गए हैं। विधि के अनुसार किए हुए चार दान मध्‍यम हैं और शेष कनिष्‍ठ माने गए हैं, यही दान की त्रिविधता है। गृह, मंदिर या महल, विद्या, भूमि, गौ, कूप प्राण और सुवर्ण- इन वस्‍तुओं का दान अन्‍य दानों की अपेक्षा उत्‍तम है। अन्‍न, बगीचा, वस्‍त्र तथा अश्‍व आदि वाहन- इन मध्‍यम् श्रेणी के द्रव्‍यों को देने से यह मध्‍यम दान माना गया है। जूता, छाता, बर्तन, दही, मधु, आसन, दीपक काष्‍ठ और पत्‍थर आदि- इन वस्‍तुओं के दान को श्रेष्‍ठ पुरूषों ने कनिष्‍ठ दान बताया है। ये दान के तीन भेद बताये गए हैं।
अब दान नाश के तीन हेतु बताए हैं। जिसे देकर पीछे पश्‍चाताप किया जाए, जो अपात्र को दिया जाए तथा जो बिना श्रद्धा के अर्पण किया जाए, वह दान नष्‍ट हो जाता है। पश्‍चाताप, अपात्रता और अश्रद्धा – ये तीनों दान के नाशक हैं। इस प्रकार सात पदों में बंधा हुआ यह दान का उत्‍तम महात्‍म है।
इस प्रकार यदि प्रत्‍येक दानकर्ता दान करते समय उपरोक्‍त तथ्‍यों का पालन करे तो न सिर्फ वह दान के वास्‍तविक एवं व्‍यवहारिक लाभों से लाभांवित हो सकता है, अपितु दानकर्ताओं द्वारा स्‍वयं की एवं साधनों की शुद्धि के पालन के फलस्‍वरूप सामाजिक एवं राष्‍ट्रीय जीवन में सद्गुणों, सद्भावों एवं सुव्‍यवस्‍था का सुंदर अवतरण अवश्‍यमेव होगा।


अमित प्रजापति
Mo. +919981538208
190, चित्रांश भवन, राजीव नगर, विदिशा (म प्र) पिन- 464001
Email- amitpraj@in.com
amitprajp@gmail.com

Tuesday, October 13, 2009

विदेशी लोकतंत्र

चल रही है नोटंकी गरीबों की झोपड़ी में, रोज ब रोज ।
गरीबों के हालात अपनी जगह, राजनीति अपनी जगह ।।

निवाला तक खा जाते हैं, गरीबों का झोंपड़े मे जाकर ।।
जनपथ में करोंड़ों को इफ्‍तार अपनी जगह, राजनीति का साम्‍प्रदायीकरण अपनी जगह।।

खरीदा कलावती को, चुनाव लड़ने से रोका ।
नोटों का खेल जारी है अपनी जगह, दादागिरी भी अपनी जगह ।।

सबूत मिटा दिए सारे, नोट भी ले जाने दिए क्‍वात्रोची को।
अहसानदारी देश पर अपनी जगह, व्‍यापार दलाली का अपनी जगह ।।

शताब्‍दी में बैठकर होता है, आम आदमी सा सफर ।
पत्‍थरों का खौफ अपनी जगह, सादगी का ढ़ोंग भी अपनी जगह ।।

वंशवाद फलफूल रहा, युवाओं के नाम, कभी महिलाओं के नाम पर ।
चालान काटने में व्‍यस्‍त है हवलदार अपनी जगह, ट्राफिक जाम इस देश का अपनी जगह ।।

नोटों से खरीदकर, बचायी थी सरकार जिस लिए ।
123 समझोता कर मूर्ख बने अपनी जगह, परमाणु धार कुंद हुई अपनी जगह ।।

अपराधियों का ज्‍वांइट वेंचर, लुटेरों का प्रायवेट लिमिटेड है ।
टेक्‍स भरने को लंगोटी गिरबी गरीब की अपनी जगह, स्विस बेंक में नेताओं के खाते अपनी जगह ।।

अर्थशास्‍त्री तो हैं ही, उच्‍च शिक्षित मंत्रियों की फौज भी सरकार में ।
गरीबों पर मंहगाई का दंश अपनी जगह, कठपुतिलियों की डोर भी अपनी जगह ।।

क्‍या बेबसी इस देश की, तुष्‍टीकरण से हो गई ।
जवानों का खून बहे अपनी जगह, आतंकियों को सरकारी शह अपनी जगह ।।

राम सेतु पर प्रहार, व्‍यापार के नाम पर ये शगल पुराना है ।
विज्ञान, आधुनिकता, धर्मनिरनेक्षता ये बहाने अपनी जगह, हिन्‍दु समाज के खिलाफ षडयंत्र अपनी जगह ।।

विश्‍व गुरू थे कभी, फिर शिक्षक बने, अब वो भी नहीं ।
सांस्‍कृतिक लुप्‍त हुईं अपनी जगह, पाठशालाऍं हो चलीं विदेशी शापिंगमॉल अपनी जगह ।।

अमेरिकी आदेश पर नीतियॉं बन रहीं इस देश में ।
भारतीय छात्रों से डरे बुश ओबामा अपनी जगह, शिक्षा की सिब्‍बल नीति अपनी जगह ।।

विश्‍वकर्मा केद हुए, शिल्‍पी भी मजबूर हुए मजदूरी को ।
रेशम सुख भोगती मल्‍टीनेशनल अपनी जगह, हम आम जन रेशम के कीड़े अपनी जगह।।

भूखा, नंगा, बेसहारा घूम रहा अन्‍नदाता देश का ।
भूपति श्रीहीन हो दास बनेअपनी जगह, अन्‍नपूर्णा सुफला धरा का अधिग्रहण अपनी जगह।।

बनाया था ताजमहल गरीबों के खून से, मुहोब्‍बत की याद में ।
व़ो विदेशी शहंशाह थे अपनी जगह, ये विदेशी लोकतंत्र भी अपनी जगह ।।



अमित प्रजापति
Mo. +919981538208
190, चित्रांश भवन, राजीव नगर, विदिशा (म प्र) पिन- 464001
Email- amitpraj@in.com
amitprajp@gmail.com

Friday, September 11, 2009

आत्‍म विस्‍मरण

पिछले दो-तीन दिनों से समाचार पत्रों में किसी कोने पर छोटे-छोटे से समाचार छप रहे हैं कि पाकिस्‍तान से हिंदू पलायन कर रहे हैं, औरतों और बच्‍चों को अपहरण हो रहा है, उन्‍हें मुस्‍लमान बनाया जा रहा है। ¬पाकिस्‍तान के रहिमयार खान जिले के निवासी राणराम ने पाकिस्‍तान से भारत पहुँचने पर एक पत्रकार को बताया कि उसकी पत्‍नी को बलपूर्वक उठाकर उसके साथ बलात्‍कार किया गया व उसका(पत्‍नी का) धर्मान्‍तरण कर दिया गया। उसकी छोटी सी बच्‍ची को भी तालीबानियों ने अपहरण कर उसका भी नाम बदलकर शबीना रख दिया। आज कल रोज हिंदु पाकिस्‍तान में हो रहे अत्‍याचारों से पीड़ित भारत की ओर पलायन कर रहे हैं, भारत सरकार से वीजा मांग रहे हैं।
यह आजकल या कुछ महीनों से शुरु हुआ किस्‍सा नहीं है, स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही ये सब जारी है। स्‍वतंत्रता प्राप्ति के समय जहॉं काफी लोग भविष्‍य में होने वाली परेशानियों की कल्‍पना कर व उस समय चल रही मारकाट से घबराकर पलायन कर भारत आ गए वहीं बहुत से हिंदु परिवार मातृभूमि से अपने भावनात्‍मक लगाव के चलते वहीं रह गए। वैसे ही जैसे यहॉं बहुत से मुसलमान रुक गए। परन्‍तु जहॉं एक ओर भारत में रह रहे मुसलमान आर्थिक और जनसंख्‍यात्‍मक रूप से वृद्धि करते चले गए वहीं पाकिस्‍तान में रह रहे हिंदु लगातार कम होते चले गए। यह बात किसी से भी छिपी नहीं है। दुनिया में ढ़ोल पीटते मानवाधिकार के ढ़ोंगियों को यह सब कभी दिखाई सुनाई नहीं दिया। हिंदुस्‍तान में भी धर्मनिरपेक्षता का पाखण्‍ड करने वाले राजनीतिज्ञों और तथाकथित प्रगतिवादी बुद्धिजीवियों को भी इन पीड़ित का दुख दिखाई नहीं देता। ये वही धर्मनिरपेक्षतावादी व बुद्धिजीवी हैं, जो एम. एफ. हुसेन और हबीब तनवीर जैसे छद्मभेषी कलाकारों (कला अक्रांताओं) की अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता की लड़ाई के लिए सड़कों पर प्रदर्शन करते नजर आते हैं, परन्‍तु इनमें से किसी को भी कभी पाकिस्‍तान में रह रहे हिंदुओं पर हो रहे अत्‍याचारों ने पीड़ित या व्‍यथित नहीं किया। हिंदुस्‍तान में अल्‍पसंख्‍यकों को विशेष अधिकार दिलाने के लिए जमीं-अस्‍मां एक कर देने वाले इन अति मानवतावादियों को कभी पाकिस्‍तान में छूट गए अपने भाई बहनों पर हो रहे अत्‍याचारों ने कभी आहत नहीं किया।
चलिए, पाकिस्‍तान में हो रहे अत्‍याचार नहीं दिख पाते आपको, पाकिस्‍तान के आगे आप लाचार हैं। भारत के अन्‍दर कश्‍मीर में पी‍ढ़ियों से रह रहे हिंदुओं के साथ क्‍या नहीं हुआ सारी दुनिया जानती है।अपने ही पुरखों की धरती और विरासत को छोड़कर मारे मारे फिरते इन परिवारों के दुखों को सुनना है तो दिल्‍ली में कश्‍मीर से निर्वासित् सैकड़ों हिंदु परिवार ऑंखों में ऑंसु लिए मिल जाएगें।
ये ऑंसू, ये दर्द, ये घाव किसी हिंदुस्‍तानी अल्‍पसंख्‍यक चिंतक को क्‍यों नहीं दिखाई देते, ये मुझ अल्‍प बुद्धि को कोई समझा दे तो सारे जीवन उस महान आत्‍मा की चरण वंदना करूँ।
आज हिंदुओं और भारतीय संस्‍कृति पर गहरे से गहरा घाव कर इनाम लूटने की होड़ लगी है।इस होड़ में बेशर्मी की हदों को पार करना रोज का खेल है। अरुन्‍धती राय को कश्‍मीर में हिंदुओं पर हुए अत्‍याचार नहीं दिखाई देते पर भारतीय सेना को कटघरे में रखने में सेकण्‍ड की भी देर नहीं लगातीं। कश्‍मीरी आतंकवादियों और अलगाववादियों की खुलेआम तरफदारी करती हैं, भारत के प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में उनके भारत विरोधी लेख छपते हैं और सरकार सोती है किसी पर कोई कार्यवाही नहीं होती।
कहने की जरूरत नहीं कि इस तरह के जितने भी तथाकथित बुद्धिजीवी आए दिन अपनी प्रतिभा प्र‍दर्शित करते रहते हैं यह सब किसी न किसी विदेशी षडयंत्र का बिके हुए हिस्‍से हैं। पर यह इतने खुले आम इतनी आसानी से संचालित है कि लगता है कि कोई चरागाह है जहॉं कोई भी धास चर सकता है। आज लोग रुपयों की चाह में, पुरुस्‍कार पाने की होड़ में अपने ही देश को, धर्म को बेचने में लगे हुए हैं।
विचारणीय तथ्‍य यह है कि जिस धर्म ने, जिस देश ने दुनिया को गीता जैसा ग्रन्‍थ दिया उसी के मानने वाले आज इतनी दयनीय, शोचनीय अवस्‍था में हैं। जिस गीता को सुनकर अर्जुन ने अपने पौरुष का इतिहास गढ़ दिया, उसी ग्रन्‍थ की पूजा करने वाले आज कीड़े मकोड़ों से ज्‍यादा घृणित जीवन जी रहे हैं। इससे ज्‍यादा उपहास जनक और लज्‍जाजनक कुछ नहीं हो सकता।
इस सबके मूल में दो ही कारण नजर आते हैं, एक भौतिकवाद की ओर हमारा ज्‍यादा झुकाव होना और दूसरा अपनी ही जड़ों से दूर होना है। आज आतंकवाद जैसी समस्‍या का समाधान हम गांधी वाद में ढ़ूंढ़ते हैं, इससे बड़ा जोक मुझे नजर नहीं आता। यह किन कपोल कल्‍पनाओं और मुगालतों में जीते हैं हम! आतंकवाद और इस तरह के जितने भी संक्रमण हैं इनका एक ही समाधान नजर आता है और वह है कृष्‍ण । कृष्‍णा का जीवन दर्शन ही मात्र इन सारी समस्‍याओं का समाधान है। अगर हम सूक्ष्‍मता से कृष्‍ण पर विचार करें तो पाएंगे कि जहॉं एक ओर सर्वशक्तिमान थे पर अपने धर्म, राज्‍य और राजा के सेवक की तरह अपनी सेवाऍं देते रहे। उन्‍होंने अपनी शक्ति, सामर्थ्‍य का एक मात्र उपयोग धर्म और न्‍याय की स्‍थापना और सशक्तिकरण के लिए किया। सारे वैभव के स्‍वामी होने के बाद भी वह वैराग्‍य से पूर्ण थे, निष्‍काम कर्म के प्रणेता और पालनकर्ता थे। अधर्मियों, अत्‍याचारियों और उत्‍पातियों के विनाश के लिए उनमें साम, दाम, दण्‍ड और भेद की नीतियों के चुनाव में तनिक भी संकोच नजर नहीं आता और साथ में मानवता की लिए अगाध प्रेम भी और सेवा भाव भी नजर आता है इन सारे सूत्रों को का पालन ही न सिर्फ हमारे धर्म और राष्‍ को पुनर्स्‍थपित कर सकता है वरन् संपूर्ण मानवता को दिशा दे सकता है।
परन्‍तु विडम्‍बना देखिए कि हम अपनी बहुमूल्‍य निधि को भूलकर भीख मांगते फिर रहे हैं। हम अपने अंदर के प्रकाश को भूलकर अंधेरे में भटक रहे हैं। जिस तरह से एक झूठ कई झूठों को जन्‍म देता है, वैसे ही आजादी और आजादी दिलाने वालों के भ्रम में पड़कर हम और हमारा राष्‍ भ्रमित होता चला जा रहा है। वक्‍त है हम हमारे आत्‍म और मानसिक मंथनों से अपनी वास्‍तविक उन्‍नति का अमृत पाने की कोशिश करें क्‍योंकि अगर हम अब भी न संभले तो कब संभलेंगे।

अमित प्रजापति
Mo. +919981538208
190, चित्रांश भवन, राजीव नगर, विदिशा (म प्र) पिन- 464001
Email- amitpraj@in.com
amitprajp@gmail.com