वन्‍दे मातरम् !!!!






Saturday, September 5, 2009

स्‍नेह बंधन की पराकाष्‍ठा - श्राद्ध

जन्‍म प्राप्ति से मृत्‍यु तक माता-पिता का बच्‍चों के प्रति स्‍नेह उन्‍हें जीवन में पल-पल संघर्ष के प्रेरित करता है। माता-पिता का बच्‍चों के प्रति स्‍नेह ही बच्‍चों को अच्‍छी शिक्षा, सुखसुविधाओं के साधनों को इकट्ठा कर उन्‍हें ज्‍यादा से ज्‍यादा खुश देखने के लिए जीवन की दुष्‍वारियों से पार पाने की शक्ति देता है। माता-पिता तो अपने कर्तव्‍य का यथा शक्ति पालन कर इस दुनिया से विदा हो जाते हैं और जीवन की आपाधापी में वह समय कब आकर चला जाता है पता ही नहीं चलता और अक्‍सर उनके चले जाने के बाद ही बच्‍चों को अपने माता-पिता के अपने प्रति प्रेम का अहसास होता है।बच्‍चों का अपने माता-पिता दादा-दादी बल्कि और उनके भी पूर्वजों के प्रति अपने प्रेम, सम्‍मान और धन्‍यवाद् व्‍यक्‍त करने के धार्मिक स्‍वरूप को ही हम श्राद्ध के रूप में जानते हैं। सारे विश्‍व में अपने पूर्वजों के प्रति मनुष्‍य के ऐसे अनन्‍य प्रेम संबंधों को मृत्‍यु पर्यन्‍त भी निभाने की परम्‍परा एकमात्र भारतीय संस्‍कृति में ही देखने को मिलती है।
अक्‍सर श्राद्ध के विषय में सवाल मन में आता है कि मरे हुए जीव तो अपने कर्मानुसार शुभाशुभ गति को प्राप्‍त होते हैं; फिर श्राद्धकाल में ये अपने पुत्र के घर कैसे पहुँच जाते हैं। जो लोग यहॉं मरते हैं, उनमें से कितने ही इस लोक में जन्‍म ग्रहण करते हैं कितने ही पुण्‍यात्‍मा स्‍वर्गलोक में स्थित होते हैं और कितने ही पापात्‍मा जीव यमलोक के निवासी हो जाते हैं। यमलोक या स्‍वर्गलोक में रहने वाले पितरों को भी तब तक भूख प्‍यास अधिक होती है, जब तक कि वे माता पिता से तीन पीढ़ी के अन्‍तर्गत रहते हैं – जब तक वे श्राद्धकर्ता पुरुष के – मातामह, प्रमातामह या वृद्धप्रमातामह एवं पिता, पितामह या प्रपितामाह पद पर रहते हैं तबतक श्राद्धभाग ग्रहण करने के लिए उनमें भूख-प्‍यास की अधिकता रहती है।पितृलोक या देवलोक के पितर तो श्राद्धकाल में सूक्ष्‍म शरीर से आकर श्राद्धीय ब्राणों के शरीर मे स्थित होकर श्राद्धभाग ग्रहण करते हैं परंतु जो पितर कहीं शुभाशुभ भोग में स्थित हैं या जन्‍म ले चुके हैं, उनका भाग दिव्‍य पितर आकर ग्रहण करते हैं और जीव जहॉं जिस शरीर में होता है वहॉं तदनुकूल भोग की प्राप्ति कराकर उसे तृप्ति पहुँचातें हैं।
ये दिव्‍य पितर नित्‍य एवं सर्वज्ञ होते हैं। अग्निष्‍वात्‍त, बर्हिषद्, आज्‍यप, सोमप, रश्मिप, उपहूत, आयन्‍तुन, श्राद्धभुक तथा नान्‍दीमुख। आदित्‍य, वसु, रुद्र तथा दोनों अश्विनीकुमार भी केवल नान्‍दीमुख पितरों का छोड़कर शेष सभी को तृप्‍त करते हैं। ये पितृगण ब्रह्माजी के समान बताये गये हैं; अत पद्मयोनि ब्रह्माजी उन्‍हे तृप्‍त करने के पश्‍चात् सृष्टिकार्य प्रारंभ करते हैं।
इनके सिवा, दूसरे भी ऐसे मर्त्‍य – पितर होते हैं, जो स्‍वर्गलोक में निवास करते हैं। वे दो प्रकार के देखे जाते हैं; एक तो सुखी हैं और दूसरे दुखी। मर्त्‍यलोक में रहने वाले वंशज जिनके लिए जिनके लिए श्राद्ध करते हैं और दान देते हैं वे सभी हर्ष में भरकर दवताओं के समान प्रसन्‍न होते हैं। जिनके लिए उनके वंशज कुछ भी दान नहीं करते, वे भूख प्‍यास से व्‍याकुल और दुखी देखे जाते हैं। जब प्रमादी वंशज पितरों का तर्पण नहीं करते, तब उनके पितर स्‍वर्ग में रहने पर भी भूख प्‍यास से व्‍याकुल हो जाते हैं; फिर जो यमलोक में पड़े हैं, उनके कष्‍ट का तो कहना ही क्‍या है ?
यदि मनुष्‍य पिता, पितामह और प्रपितामह के उद्देश्‍य से तथा मातामह, प्रमातामह और वृद्धप्रमातामह के उद्देश्‍य से श्राद्ध तर्पण करेंगे तो उतने से ही उनके पिता और माता से लेकर दिव्‍य पितरों तक सभी पितर तृप्‍त हो जायेंगे। अमावस के दिन वंशजों द्वारा श्राद्ध और पिण्‍ड पाकर पितरों को एक मास तक तृप्ति बनी रहेगी । सूर्य देव के कन्‍या राशि पर स्थित रहते समय अश्विन कृष्‍ण पक्ष (पितृ पक्ष) में जो मनुष्‍य मृत्‍यु तिथियों पर पितरों के लिए श्राद्ध करेंगे, उनके उस श्राद्ध से पितरों को एक वर्ष तक तृप्ति बनी रहेगी। उस समय शाक के द्वारा भी जो मनुष्‍य श्राद्ध नहीं करता उसे कठिनाईयों जैसे संतान आभाव व धन आभाव आदि का सामना करना पड़ता है।यदि मनुष्‍य गया शीर्ष में जाकर एक बार भी श्राद्ध कर देंगे तो उसके प्रभाव से सभी पितर सदा के लिए तृप्‍त हो जाते हैं।
उत्‍तम कर्मों से उपार्जित धन से पितरों का श्राद्ध करना ही पुण्‍य लाभ दिलाता है। छल कपट चोरी और ठगी से कमाये हुए धन से कदापि श्राद्ध न करें। श्राद्ध श्रद्धा से किए जाएं तो पुण्‍य फल दायी होते हैं।श्राद्ध करते समय मन में पितरों को सद्गति, मोक्ष, आगे प्राप्‍त होने वाले जन्‍म में भगवद्भक्ति, प्रभु भक्ति व प्रेम संसकार, धर्मनिष्‍ठा जैसे उत्‍कृष्‍ठ भगवद् आर्शीवाद भगवान से पितरों को प्राप्‍त हों ऐसी कामना और प्रार्थना भी श्राद्ध कर्ता के मन में हों तो निसंदेह पितरों को शांति प्राप्‍त होती है, इसमें कोई संशय नहीं होना चाहिए। ऐसा कहा जाता है जिस कुल किसी एक मनुष्‍य को गुरू कृपा प्राप्‍त हो और वह गुरू से दीक्षित हो तो उस दीक्षा प्राप्‍त मनुष्‍य की अगली पिछली सात पीढ़ीयों का उद्धार होता है अत यह वर्णन करना अतयन्‍त प्रासांगिक है कि कर्मकाण्‍ड के साथ प्रभु शरण और भगवद् चरणों में पूर्ण समर्पण ही जीवन का मूल सार है।



अमित प्रजापति
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3 comments:

  1. sahard, par apki post sacmuch bhut achi lagi apney kitney sarlata se eska mahtav samja diya nayi pidi ke liye samajhnay ke liye kafi hai....thanks to u for such a nice post

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    1. Thanks Sunita ji ....sorry for late reply....

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  2. इसमें कोई संशय नहीं होना चाहिए। जिस कुल किसी एक मनुष्‍य को गुरू कृपा प्राप्‍त हो और वह गुरू से दीक्षित हो तो उस दीक्षा प्राप्‍त मनुष्‍य की अगली पिछली सात पीढ़ीयों का उद्धार होता है

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